सत्ता के मदमस्त लोग क्या समझते है.
हमे नही पता पर यह सच है की संघ प्रणित भाजपा सरकार इन पाच सालो की चलाएे जानी वाली सरकार के जरीएे यह तय करना चाहती है.
की हम इन पाच सालो मे देश के न्याय व प्रशासन मै आगे के २५-३० सालो तक अपना सिक्का जमाएे रखेगे यह कोई मामुली सोच नही.
यही सोच के साथ इसी धरती पर पुर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वही किया.
संघ बहोत अच्छी तरहॉ जानता है और उसके नापाक कदम उसी तरहॉ बढ रहै है.
आज इस देश मै दो चेहरे सामने आते नजर आ रहै है.
एक जो न्याय के लिये लढ रहा है
तो दुसरा उसे दबाने के लिये.
पर क्या न्याय मागती कौम या लोंग कमजोर है.
या अपनी माग को रखने व न्याय को मागंने के लिये संविधानिक तौर पर अपनी देशभक्ती साबित करनी पड रही है.
ऐैसा लगता है.
देशभक्ती , भारत माता , या तुम्हे वतन से प्यार नही , गद्दार वैगरे शब्द या
फिर देश के खिलाफ नारे मारने का बनावा यह सब बातो से लोंगो का ध्यान
भटकाकर व अन्याय सहन करते न्याय मागती कौम वा वर्ग को दरसल दबाने की साजिश
दिखाई देती है.
बहूत चिचौंरा व बैहद्द कमजोर एैसा वर्ग सत्ता पर बैठा हमे दिखता है.
एखादे मासुम बच्चो द्वारा अपने बाप को शिकायत बताये जाने पर बाप सामने वाले
को गलत सलत बातों पर फटकार लगाकर बैबुनियाद बातो पर आरोपी बनाता है वैसे
ही सत्ताधारी कर रहा है.
यह चिचौंरी गिरी नही तो क्या है ...गर नागपुर की भाषा मै कहॉ जाये तो फन्टरगिरी या लौफर बाजी है.
यह संघ प्रणित सरकार एक खेल के तर्ज पर बिठाई गयी जो तुम्हारे पसंद का उसे
सत्ता मै सामिल करो जो तुम्हारे करीब का उसे पद दे दो चाहे वो उस काबिल हो या ना हो.
यह बहूत मामुली बात लगती. देश का विकास धर्म के आधार पर नही होता.
दरसल देश का विकास शौषित पिढीत आदिवाशी और अल्पसख्यांक लोंगो के भविष्य को सुधारकर उन्हे देश के विकास मै सम्मलित करके होगा.
ऐसा न करना
यह एक तरीखे से छुवा-छुत है. जिसे सत्ता धारी उन लोंगो पर अमल लाती है.
जो आज देश की सत्ता से दुर व उन सब सुविधा से दुर अपनी कठीण जिदंगी काट रहै हे.
दलित-आदिवाशी-अल्पसंख्याक और वह जो बेहद्द लाचारी व गरीबी मे जिवन काट रहै है जिन्हे हम धर्म के तरांजू मे तौलते है.
हम समता वादी विचारो पर काम करते है ओर समता विचारों को मानते है. तौ हम उस भी गरीब दबके को छोड नही सकते वो चाहे कोई भी धर्म का हो.
साथ साथ इस देश का और इस देश के विकास के दो हात मजदूर - किसान यह दो हाथो
को बलशाली बनाने पर काम होना चाहीये पर तत्कांलिन सरकार ऐसा नही चाहती नाही
उन्हे उनके अधिकार को देने पर मजुंर होती ये तो सरासर बेईमानी होगी या है.
किसी के रक्त ओर पसिने से सत्ताधारी अपनी प्रगती नही कर सकता. ऐैसे मलिन्दा खाने वाले लोंग ज्यादा दिन तक नही रहते.....!!
आज जो कूछ हो रहा है यहा तानाशाही के प्रतिबिंब जैसा नजर आ रहा है.
एक तरफ भारत को हम देशभक्ती के आईने से देखते है ओर विचार विदेशी मनुष्य के पेरते है यह कैसा इंन्साफ है.
" सारे जहॉ से अच्छा हिंन्दूस्ता हमारा " कहना ओर बात हिटलर मुसलोनी की
करना यह हिंन्दूत्व तो नही हो सकता. यह तो अंग्रेजो को भगाकर एक धर्मवादी
ताकतो के साथ किया गया समझवता है की सत्ता भले ही हमारी होंगी पर राज
तानाशाही के विचारो पर...!!
इस तानाशाही को यही तोंडने की पारी है जो वर्ग तयार हो चुका है.
हवा बदल चुकी है तानाशाही अपने अंतिम चरण पर है यह साबित हो चुका है.!
देखना है तो अपने आंखो से मनुवादी सोंच के डर का परदा उठाना पडेगा. ओर आज उसकी जरुरत आन पडी है....!
जय भिम..