शनिवार, 21 जून 2025

अवकाळी ओळी 💙

“ कि ये सुंदरे तु इतकी लखलखीत असावी 
कि तुझे ते कोमल हात माझ्या हृदही स्थळी असावे..
मी बेभान होहुनिया तुझ्याच स्पनंदनातं राहावे 
कि...
तु असावी गोजिरवाणी प्रेमात माझ्या..?
आणि मी तुझ्या जिंदगाणीत राहावे...?

अवकाळी ओळी...⛈️

“ मै कलम मे शहाई भर...

“ मै कलम मे शहाई भर निकल पडा हू जंग लढने अकेले मे..
वह डरे है शहमे है, देख मेरे बुलंद हौंशले से...

उन्हे लगता है, कलम हतियार नही होती...
मेरा मानना है, कभी तलवार भी शिर कलम नही करती...

हौंशले बुलंद हो, तो हर बांध को तोडा जा सकता है...
घंटो कि लढाई को मिंटो मे रुकाया जा सकता...

पर फिर एक बार चुनौंती खडी कि जा रही है...
आजादी के खिलाफ गुलामी कि जंग छेडी जा चुकी है...

क्युकी सत्ता है, एक सरफिरे कातिल के हात मे...
वजूद-एे-दास्ता मिटाने वाले खुनी-बहरुपिये के साथ मे...

कि इसी लिएे...
मै कलम मे शहाई भर निकल पडा हू, उस इतिहास को बचाने उस इतिहास से जंग लढने अकेले मे...!

२३_मई इतिहास के पन्नो मे जोडा जायेंगा.

_रोहित भगत
_सम्यक विद्यार्थी आंदोलन