कि हुक्मरान हो तुम?
जो इंसान को इंसान न समझे,
वही असल में गद्दार हो तुम।
कुर्सी की भूख में अंधे होकर,
ख़ून से लिखते हो कानून—
दरिंदों की तरह नोचते हो,
और खुद को कहते हो मासूम।
मिटाने चले हो जिस इंसान की हस्ती,
उसकी साँसों से बना है तुम्हारा वजूद,
उसी मिट्टी से जन्मे हो तुम,
जिसे माँ कहकर
मादरे-वतन कहते हो तुम।
जो ज़ुल्म को राष्ट्रभक्ति कहे,
जो सवाल को गुनाह बनाए—
इतिहास लिखेगा साफ़ लफ़्ज़ों में,
देशद्रोह वही निभाए। 🚩
देशद्रोह…📮
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