बडी सरकारी रिहायत मिलने वाली स्कुलों मे अगर किसी के साथ छेडछाड या दरिदंगी होती हो तो हम मानविय तौर पर अमानविय घटना कहकर चुप तो हो जाते है.
पर उस स्ट्रक्चर को ही तोड नही पाते जिसकी बुनियाद आज का आधुनिक पुजिंवाद है.
हा हरियाणा के प्रद्युम्न कि हत्या के बारे मे रखना है,पर क्या उंच्ची शिक्षा के नाम से तथा आधुनिक नये विकंल्पो के सहारे ही समाज को यह चेताया जा सकता है कि वह उन सब पर भरोंसा करे जिसपर वर आस लगाये बैठे है.
या शिक्षा जो चंद पुजिंवादी ताकतो का गढ़ भी अब मानी जा रही है ( कुछ मिडियॉ पार्टनर/ उद्योंगपती ) स्कुल भी चलाने लगे है.
खैर आधूनिकता के काल मे हम सत्ता तक मशिनों ( EVM ) से हासिल करने मे लगे है, जहा लोकतंत्र जैसे शब्दों / नाम से सत्ता को ढाक लिया जाता है.
पर हा और एक बात को सरकार तथा उसके चालक देखे कि जिस तरहॉ अमानविय तौर पर एक सात साल कि भरी स्कुल मे हत्या हो जाती है, तो भी आपका सिस्टम उसे ना उस स्थिती से बचा सका और नाही हत्या जैसे क्रुरकांड होने से रोख सका.
यह शहर के हालात है....!
ठिक उसी तरहॉ आदिवासी तथा पिछडा कहे जाने वाला छत्तिंसगढ़ का बस्तर / दंतेवाडा जो नक्षलप्रभावित इलाका होने के बारे मे कई बार बोला गया व पेश किया जाता है.
वही कुछ एक दिनो पहले सरकार द्वारा नियुक्त सुरक्षा कर्मी ( केंन्द्रीय पुलिस ) को राखी कार्यक्रम के हेतू लडकीयों के आदिवासी स्कुल छांत्रावास मे ले जाकर वहा कि आदिवासी लडकीयों से राखी बाधंने का कार्यक्रम किया गया.
परंन्तू वही कुछ सुरक्षा कर्मी ( केंन्द्रीय पुलिस ) द्वारा कुछ लडकी को बाथरुम के पास रोक छेडछाड कर मारा गया.
और विरोध करने पर उन्हे ही पुलिस स्टेशन मे कई घंटो तक बैठाकर पिढीत तक किया गया.
यह बताते कि सुरक्षा के चलते करना पडा.
यह निर्दयता नही तो क्या है...?
पर क्या प्रद्युम्न तथा उस आदिवासी क्षैत्र कि लडकीयों के इस घृणता पुर्व प्रकार मे साम्यता नही.
जहा प्रद्युम्न के बारे मे हम अमानविय घटना जैसे शब्द को रखकर समिट जाते है.
वही सुरक्षा कर्मी ( केंन्द्रीय पुलिस ) द्वारा आदिवासी लडकीयों के साथ कि बदसलूकी तथा राखी जैसे रिश्ते को कंलकित कर आदिवासी क्षैत्र को और अविकसित तथा सरकार विरोधी बनाने जैसे कार्य तक लेकर जाने जैसी स्थिती को निर्माण करने जैसा स्थिती मे नही.
हा जिस तरहॉ प्रद्युम्न के हत्यारे को पकड कर बडी से बडी शिक्षा के प्रावधान के दायरे मे रख सरकार सब तार तो लेगी.
पर उन इंन्साफ मांगती लकडीयों का क्या..?
और उनके आवाज को बुलंद करती महिला कार्यकर्ती सोनी सुरी के साथ होता बर्ताव का क्या ...?
जो हम मानविय तौर वाले विचार रखने वाले उस अत्याचार को अमानविय घटना मे नही देखते और सिर्फे खामोंश रहकर अपना मुक समर्थंन दर्शाते है.
साथिंयो जताना नही है कि हम हाय-सोसायटी के चेहरे वाले लोग सिर्फे अपने आप को ही झझोंडते रहते है.
जिसका चेहरा शहर तथा उंच्ची इमारतो से ही नजर आता है.
असल चेहरा बस्तर/दंतेवाडा तथा महाराष्ट्र से लगा गडचिरोंली तथा देश का पुरा ग्रामिण इलाका है.
जिसे पुरा भारत कहने मे हमे गर्व होता है.
सोनी सोरी को सुरक्षा कर्मी ( पुलिस द्वारा )
15/09/2017 को उन अत्याचार ग्रस्त आदिवासी लडकियो न्याय मागने पर गिरफ्तार करने के विरोध मे.
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