शनिवार, 16 सितंबर 2017

दिक्षा कि भुमी या संघ कि धर्ती

दिक्षाभुमी के स्तुप के अंदर बैठ कर बहोत सोच रहा था.

.... आखिर कितनी जमिन है दिक्षाभुमी की और कितनी नही. क्या समाज हर साल सिर्फे बाबासाहब के अस्थी दर्शन हेतू ही आता है, या उससे भी ज्यादा उनके द्वारा दी गयी विचारो की श्रखंला को आत्मसात करने.

मै सोचता रहा और अंतत: यही कहकर मन को सहलाते निकाला कि आखिर “ मै तो भी क्यु यहा आया हू..!

जिस जगहा हमे भी अपने विचारो को रखने से रोका जाता है.

“ मै बार-बार वहा के गार्ड को देख कल लिखने वाली पोष्ट को रोखता रहा क्युकी वह बार-बार किसी को ताकीद दे रहा था कि फोटो मत खिचो वरना मोबाईल जप्त किया जायेगा ”

मै उसे देख बार-बार मोबाइल को छिपा रहा था.

और मन ही मन यह महसूस भी कर रहा था कि वह क्यु उसे बाबासाहब के तस्विर वाली यादो को लेने से रोख रहा है. क्या समाज के अंदर बाबासाहब के तस्विरो द्वारा कार्य है जो पुरी प्रेरणा स्त्रोंत कहे जाने चाहीएे सार्वजनिक न हो..!

दरसल कुछ तटपुंजे लोग तथा स्मारक समिति मे सामिल उस जनसंघ के टिकट से राजनिती मे पैर रख सत्ता का सुख भोंगने वाले लोग है जो बाबासाहब के नाम से उसी जमिन कि भांड खाकर जिंदा है.
जिस जगहा बाबासाहब ने स्वयंम ‘धम्म ’ का स्विकार किया था.

वह नही चाहते कि समाज के प्रति दिक्षाभुमी संवेदनशिल हो.

वह वहा कुछ एक तटपुंजे पंडितो तथा ब्राम्हणवादी सोच रखने वाले विचारो को अस्थाई तौर पर पैर जमाने मे मदत करते है.

जिसका जल्द हे समाज के सामने मे नया चेहरा आ जायेगा.

पुरे दिक्षाभुमी परिसर तथा बाहरी क्षैत्र पर अधिकाश सत्ता शासन-प्रशासन तथा पुलिस द्वारा कब्जा जमाने जैसे हरकत आम तौर पर होती नजर भी आ जायेगी.

तथा दिक्षाभुमी के अंदर के परिसर मे कुछ संयशग्रस्त लोगो का बसेरा जिनका विरोध करने पर उन्हे पागल कह छोडता स्मारक समिती का विचार तथा गेट पर मौजूदा पुलिस का रव्वैया नजर आता नजर आयेगा.

हा यह बात कहीयों कि गवारी नही होगी कि हम जिसे अपना प्रेरणास्थान या श्रध्दास्थान समझते है. वह किसी बेतूकी बातो द्वारा मलिन हो पर क्या अपने अंदर लगी किड को हटाना ना-मुरादगी है यह भी हमे सोचना आवश्यक रहेंगा.

तो यह सारी संवेदन बाते है फिलहाल मित्रों हालात बत्तर है और RSS उस परिसर मै अपना पैर जमाना चाहती है.

जिसकी सुरुवात सरसंघचालक सुदर्शन के वक्त ही सुरु हो गयी थी.

जो बाबासाहब को माला पहनाकर उनके विचारो की धज्जिया उडाते संविधान बदलने कि बात को रख कर निकल गये थे.

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