‘ भारत कि चंद्रगुप्त मोर्यं ’ काल कि स्थिती-परिस्थिती तथा शरणार्थी के बारे के विवादस्पद बातो काे यह जानना आवश्यक है.
तथा चंद्रगुप्त मोर्यं के काल मे हमारे देश कि राजनैतिक अवस्था को भी.
वह स्थिती आज के काल से आधुनिक तथा नये रणनितीगार विश्लेषणों से राष्ट्र के निर्माणो कि नही थी,ना मानी जाती थी.
वह बांधीत तथा अनेक प्रांन्तिय राजपाठ कि मानी जाती थी जो स्वंयम् रक्षा हेतू अपने ही धर्म जाती तथा भाषिक वर्ग पर हमला कर अपने वर्चव्ह को बढाने मे विश्वासी थी.
हा जो शरणार्थी को आने से रोकने का चंद्रगुप्त काल मे बोला गया वह वही विदेशी आर्य-निति तथा आज के मनुवादी विचारो के भक्षक के तौर जानी गयी थी.
जो ‘ तक्षशिला ’ या उससे भी आगे
‘ हिंदूकुश ’ को लाघकर आ रही थी..!
रही बात धर्म जाती के तो भारत गत ५००० सालो से इस विष को पिकर जिंदा है और पिडीत भी जैसा किसी शिव कि तरहॉ सृष्टी को बचाने के लिये पिये विष के जैसे यहा का मुल भारतिय सह रहा हो.
अगर आज हम ‘ रोहिंग्या ’ समाज को जो सुनने मे आ रहा है की एकमेव मुस्लिम समाज नही तो वर्षा काल पहले भारत से टुट हिंदू-ओेैर-मुस्लिम समाज मे परावर्तीत होकर बट गया है तो.
हमारी वर्षां से चली आ रही तथा आंतरराष्ट्रीय स्तर पर “ प्रबुध्द ” कि भुमी समझ ने वाले देश प्रतिमा को किसी कमजोर तथा असाह्य लोगो को शरणार्थी के तौर पर आसरा देने मे कम नही होनी चाहीएे थी. आतंरराष्ट्रीय विवाद मे वहा कि अवस्था को उठाने से लेकर संयुक्त_राष्ट्र के बर्मा-म्यानमार मे हस्तक्षेप करने तर शरण देना गलत नही होगा.
क्या हमारे देश के प्रधान सेवक म्यानमार मे जाकर कोई राजनैतिक तथा व्यापारीक सम्मेलन के समझोंते का हिस्सा नही हूएे..?
क्या हम राजीव गांधी की LTTE द्वारा कि गयी हत्या को भुल गये..?
या उस बात का खेद व्यक्त करते समय यह भी नही जानते कि वहा भारत द्वारा भेंजी शांती सेना तथा श्रीलंका के आतंरिक कलह को शांत करने मे हम हमारे प्रधानमंत्री को गवा गये.
यह मुलता: उसी “ बुद्ध ” कि भुमी है जिसने विश्वशांती तथा मानवता वाद को जन्म दिया. तो यह हमारा कर्तव्य है और रहेंगा.
यह जाने बिना कि आज हमारे देश कि आंतरिक परिस्थिती बदल रही है और फिर भी हम एक “ महासत्ता ” कि और बढने का प्रयास कर चुके है.🙏
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