क्या नया चलन भारत के अर्थ-व्यवस्था मे सुधार ला सकेगा...?
जो सालो से हो रही काला-बाजारी-घुसखोरी-भ्रष्टाचार-तथा हवाला-सट्टा या आतंकवाद-नक्षलवाद जैसे कार्याे को रोख पायेगा...?
क्या देश को स्वंतत्र हूऐ 69 सालो मे सही मायने मे भारत का निर्माण हूआ है | या सिर्फे राजनैतिक दलो तथा उन दलो के नेता कहे जाने वाले बाहूबलीयो का निर्माण तथा विकास हूआ है....?
जो सालो से हो रही काला-बाजारी-घुसखोरी-भ्रष्टाचार-तथा हवाला-सट्टा या आतंकवाद-नक्षलवाद जैसे कार्याे को रोख पायेगा...?
क्या देश को स्वंतत्र हूऐ 69 सालो मे सही मायने मे भारत का निर्माण हूआ है | या सिर्फे राजनैतिक दलो तथा उन दलो के नेता कहे जाने वाले बाहूबलीयो का निर्माण तथा विकास हूआ है....?
आज देश बहूत अराजकता मे जी रहा है. या यह कहू तो अमानविय तौर पर अदमरा हूआ है.
क्या देश कि नयी सत्ता जो मानवीय तौर-तरीखे को समझकर तथा जानकर देश के अमिरो के अवैध तरीखे पर लगाम-रोख लगाने का तथा गरीबो के प्रगती के लिएे ऐैतिहासिक निर्णय लेने का दावा करती सही लग रही है...?
क्या देश कि नयी सत्ता जो मानवीय तौर-तरीखे को समझकर तथा जानकर देश के अमिरो के अवैध तरीखे पर लगाम-रोख लगाने का तथा गरीबो के प्रगती के लिएे ऐैतिहासिक निर्णय लेने का दावा करती सही लग रही है...?
बहोत शी बाते है जो देश के एक इकाई लोगो को छोड एक तिहाई लोगो पर लागू कि जाती है.
देश दो गुटो मे बाटा गया तथा आज भी उसे बरकरार रखने कि साजिश हो रही है.
अमिरी-गरीबी यह तय होती है ' रुपया ' अर्थांत आर्थिकता के आधार पर गरीब जो अपनी जिदंगी कूछ २०-६० रुपये पर या उधारमत वादीयो के सोच से २५०-३५० रुपये से गुजर करता है.
इसमे भी ' रुपया ' के स्तर को जो राशनकार्ड पर बांटा गये जैसा हो.
आज देश गरीबी से झुज रहा है.
ऐैसे मे नये चलन को बाजार मे लाकर देश के सत्ताधारी क्या साबित करना चाहते है..?
१०००-५०० का चलन जो कई सालो से देश के अर्थव्यवस्था को चला रहा था तथा देश भर के बाजार तथा व्यापार मे संतुलन रख रहा था. उसे अचानक बंद करना बहूत ही दुर्दैव पुर्वक निर्णय हो गया है.
देश दो गुटो मे बाटा गया तथा आज भी उसे बरकरार रखने कि साजिश हो रही है.
अमिरी-गरीबी यह तय होती है ' रुपया ' अर्थांत आर्थिकता के आधार पर गरीब जो अपनी जिदंगी कूछ २०-६० रुपये पर या उधारमत वादीयो के सोच से २५०-३५० रुपये से गुजर करता है.
इसमे भी ' रुपया ' के स्तर को जो राशनकार्ड पर बांटा गये जैसा हो.
आज देश गरीबी से झुज रहा है.
ऐैसे मे नये चलन को बाजार मे लाकर देश के सत्ताधारी क्या साबित करना चाहते है..?
१०००-५०० का चलन जो कई सालो से देश के अर्थव्यवस्था को चला रहा था तथा देश भर के बाजार तथा व्यापार मे संतुलन रख रहा था. उसे अचानक बंद करना बहूत ही दुर्दैव पुर्वक निर्णय हो गया है.
देश के
प्रधानमंत्री द्वारा कोई भी अद्यादेश ना देकर नाही कोई भी पुर्वकल्पना को
देकर सामान्य जनता तथा मध्यवर्ग लोगो के साथ-साथ व्यापारी तथा मजदूर-किसानो
के साथ किया गया अन्याय पुर्वक निर्णय साबित हो रहा है.
( वैसे देखा जाये तो अर्थनिती के हिसाब से चलन को बंद तथा बदलने का अंतिम निर्णय या घोषणा देश के RBI गव्हर्नर या वित्त विभाग के सर्व्हाेधिकारी ने करना चाहीएे जिसमे मा. प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप संदेहपुर्वक लग रहा है )
( वैसे देखा जाये तो अर्थनिती के हिसाब से चलन को बंद तथा बदलने का अंतिम निर्णय या घोषणा देश के RBI गव्हर्नर या वित्त विभाग के सर्व्हाेधिकारी ने करना चाहीएे जिसमे मा. प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप संदेहपुर्वक लग रहा है )
आज जो स्थिती बनी है वह देश मे अराजकता व एक अकार्येश्रमी सरकार के निती को दर्शाती है.
लोग रो रहे है... तडप रहै है... मजदूर-किसान अपने आप को मरने के कगार पर आ जाने कि बाते कर रहै है.
व्यापार ठप पडा तथा जो रोजमर्रा कि चिंजो पर लोगो कि जिदंगी गुजर-बसर होती है वह पुरी तरहॉ बांधित हो गयी है.
पुरे देश मे चलन बंद होने से रोजमर्रा के चिंजो पर चक्का जाम हो रहा है.
ऐैसी स्थिती मे वित्तमंत्री ने यह कहना कि स्थिती पुर्वरत हो जायेगे लोगो ने सयंम रखना चाहीएे.
बहूतही हास्यास्पद लग रहा है.
मा. प्रधानमंत्री राहत कि बाते कर रो-रोकर देश को उपदेश देते हूऐ कहते है
लोग रो रहे है... तडप रहै है... मजदूर-किसान अपने आप को मरने के कगार पर आ जाने कि बाते कर रहै है.
व्यापार ठप पडा तथा जो रोजमर्रा कि चिंजो पर लोगो कि जिदंगी गुजर-बसर होती है वह पुरी तरहॉ बांधित हो गयी है.
पुरे देश मे चलन बंद होने से रोजमर्रा के चिंजो पर चक्का जाम हो रहा है.
ऐैसी स्थिती मे वित्तमंत्री ने यह कहना कि स्थिती पुर्वरत हो जायेगे लोगो ने सयंम रखना चाहीएे.
बहूतही हास्यास्पद लग रहा है.
मा. प्रधानमंत्री राहत कि बाते कर रो-रोकर देश को उपदेश देते हूऐ कहते है
" देश मुझे 50 दिन दे अगर निर्णय सही नही साबित हूआ तो फाशी चढा दै "
जो व्यवस्था कि गयी वह कमजोर साबित हो रही है.
मा. प्रधानमंत्री को पुछना चाहीएे कि क्या जो निर्णय लिया गया वह पुरी तयारी से लिया गया...?
या देश के उन अमिरो के हितो कोे ध्यान मे रख कर निर्णय लिया गया जो इस देश के एक इकाई वर्ग कहे जाते है.
मा. प्रधानमंत्री को पुछना चाहीएे कि क्या जो निर्णय लिया गया वह पुरी तयारी से लिया गया...?
या देश के उन अमिरो के हितो कोे ध्यान मे रख कर निर्णय लिया गया जो इस देश के एक इकाई वर्ग कहे जाते है.
देश खुले विचारो का है | तथा मुझे लिखने मे कोई दिक्कत नही जो संविधानिक तरीके से सही तथा अभिव्यक्ती कि आजादी दर्शाता है.
तो सिधा निशाना उन पुंजिपती वर्ग पर है जो देश के राजनैतिक व्यक्तीमंत्व को रखता है.
यह देश अंबानी-अदानी-टाटा-बिर्ला तथा कोई माल्या-रामदेव जैसे अमिर उद्योंगपतीयो का नही जो सरकार उन के हित मे निर्णय ले.
यह देश मजदूर-किसान तथा मध्यमवर्ग लोगो के साथ उन गरीबो का है जो दिन-रात एक कर पसिना बहाते है.
आज इतिहास से पुछे तो यही पुंजिपती देश को सवारने कि बात करते है.
जैसे अघोषित तरीके से देश को नियंत्रित करने का दावा करते रहते है.
इस देश कि राजनैतिक गतिविधी जन-सामान्य व्यक्ती तय करता है.
जो ' मतदान ' कि तौर पर खरी साबित होती है.
पर वह भी बाधित कि गयी ' इंल्कोट्रॉनिक व्होंटीग मशिन ' अर्थांत ( EVM ) मशिन के जरीये.
पर सही मे इस देश को हम-तुम अतुंल्य भारत ; या भारत उदय् या अखंड भारत जैसे देख रहै है.
जो कहॉ जा रहा है या कहॉ गया वैसा कुछ नही.
भारत अब उन पुंजिपती तथा धर्मार्थ लोगो के हत्थे चढ चुका है.
जिसका रुप रोहीत वेमूला के संस्थागत हत्या के बाद नजर आया.
Jnu जैसे विश्व-विद्यालय के विद्यार्थि वर्ग के आवाज को देशद्रोंही कह दबाया जाना.
गरीब आदिवासी-किसानो कि कई एकड जमिन आवटंन के नाम से लुट लिया जाना.
विद्यार्थि वर्ग तथा दलित-आदिवासी आंदोलनो जैसे विषयो पर लगाम लगाने वाले कानून को अमल मे लाना.
दलितो तथा आदिवासी वर्ग को नक्षलवाद से जोडने तक के फर्मानो का आदेश निकाल पुलिस द्वारा कुट देकर हत्या तक करवाना.
यह विदूषक रुप इन पुंजिपती-धर्मार्थ शक्ती वाली सरकार द्वारा दिख रहा है.
आम तौर पर हम देश के अर्थ-व्यवस्था के चलनी भाग होते हे. पर उसे भी सरकारे तय करती है. तो जिस तरहॉ देश के अर्थनिती को छेडने के लिएे पुंजिपती-धर्मार्थ शक्ती वाली सरकार ने पहले तो रघुराम राजन जैसे तथा एक बेहतरीन अर्थ-तंज्ञ व्यक्ती को RBI गव्हर्नर पद से हटाने की साजिश कर एक पुंजिपती व्यक्तींत्व विचार के आदमी अर्थांत उर्जित पटेल ( कहा जाता है यह व्यक्ती रिलांयन्स कंपनी का सल्लागार था ) बैठाकर नोट बंदी ( 1000-500 ) चलन पर रोख लगाने का अंतिम निर्णय लिया.
वह निर्णय पुरे देश को बर्बादी कि तरफ मोड रहा है.
आज पुंजिपती धर्मार्थ शक्ती वाली सरकार पुरे तरह से देश मे हा-हाकार करने मे सक्षम हूई जो बहोत हि निदंनिय है.
तो सिधा निशाना उन पुंजिपती वर्ग पर है जो देश के राजनैतिक व्यक्तीमंत्व को रखता है.
यह देश अंबानी-अदानी-टाटा-बिर्ला तथा कोई माल्या-रामदेव जैसे अमिर उद्योंगपतीयो का नही जो सरकार उन के हित मे निर्णय ले.
यह देश मजदूर-किसान तथा मध्यमवर्ग लोगो के साथ उन गरीबो का है जो दिन-रात एक कर पसिना बहाते है.
आज इतिहास से पुछे तो यही पुंजिपती देश को सवारने कि बात करते है.
जैसे अघोषित तरीके से देश को नियंत्रित करने का दावा करते रहते है.
इस देश कि राजनैतिक गतिविधी जन-सामान्य व्यक्ती तय करता है.
जो ' मतदान ' कि तौर पर खरी साबित होती है.
पर वह भी बाधित कि गयी ' इंल्कोट्रॉनिक व्होंटीग मशिन ' अर्थांत ( EVM ) मशिन के जरीये.
पर सही मे इस देश को हम-तुम अतुंल्य भारत ; या भारत उदय् या अखंड भारत जैसे देख रहै है.
जो कहॉ जा रहा है या कहॉ गया वैसा कुछ नही.
भारत अब उन पुंजिपती तथा धर्मार्थ लोगो के हत्थे चढ चुका है.
जिसका रुप रोहीत वेमूला के संस्थागत हत्या के बाद नजर आया.
Jnu जैसे विश्व-विद्यालय के विद्यार्थि वर्ग के आवाज को देशद्रोंही कह दबाया जाना.
गरीब आदिवासी-किसानो कि कई एकड जमिन आवटंन के नाम से लुट लिया जाना.
विद्यार्थि वर्ग तथा दलित-आदिवासी आंदोलनो जैसे विषयो पर लगाम लगाने वाले कानून को अमल मे लाना.
दलितो तथा आदिवासी वर्ग को नक्षलवाद से जोडने तक के फर्मानो का आदेश निकाल पुलिस द्वारा कुट देकर हत्या तक करवाना.
यह विदूषक रुप इन पुंजिपती-धर्मार्थ शक्ती वाली सरकार द्वारा दिख रहा है.
आम तौर पर हम देश के अर्थ-व्यवस्था के चलनी भाग होते हे. पर उसे भी सरकारे तय करती है. तो जिस तरहॉ देश के अर्थनिती को छेडने के लिएे पुंजिपती-धर्मार्थ शक्ती वाली सरकार ने पहले तो रघुराम राजन जैसे तथा एक बेहतरीन अर्थ-तंज्ञ व्यक्ती को RBI गव्हर्नर पद से हटाने की साजिश कर एक पुंजिपती व्यक्तींत्व विचार के आदमी अर्थांत उर्जित पटेल ( कहा जाता है यह व्यक्ती रिलांयन्स कंपनी का सल्लागार था ) बैठाकर नोट बंदी ( 1000-500 ) चलन पर रोख लगाने का अंतिम निर्णय लिया.
वह निर्णय पुरे देश को बर्बादी कि तरफ मोड रहा है.
आज पुंजिपती धर्मार्थ शक्ती वाली सरकार पुरे तरह से देश मे हा-हाकार करने मे सक्षम हूई जो बहोत हि निदंनिय है.
" देश का गरीब सुख कि निंद सो रहा है | तथा अमीर जाग रहा है "
जैसे विधान कर गोवा के परिषद मे मा. प्रधानमंत्री रोते है.
जैसे विधान कर गोवा के परिषद मे मा. प्रधानमंत्री रोते है.
हम सत्ताधारी तथा विरोधी दोनो पक्षों से तथा सहीयोगी दलो को पुछते है.
जिसे-जिन्हे हमने चुना है क्या वह हमारी हितो कि तथा समस्या को हल करने के लिये संसद या विधान सभा मे हमारी बाते रखते है...?
क्या हमारी समस्या पर डिबेट होती है...?
या अपने ही हितो के लिएे नये बिल पारित करने पर ध्यान दिया जाता है.
अब नया फंडा लाकर जैसे कि लोगो को इलेंक्शन पुर्व काला धन स्विंझ बॅक मे होने जैसे दावे किये गये तो वह काला धन भारत के हि अदंर कैसा पाया गया...?
क्या सही मै भारत काला धन देश के अंदर जमा करता आया.
या यु कहे कि जिन पुंजिपतो तथा धर्मार्थ शक्ती कि सरकार चुनी गयी या उससेे भी पहले जो सरकारे चलाई गयी.
सभी के काले धन को लिगलाईज अर्थांत सफेद किये जाने के लिएे तथा रोहीत वेमुला कि संस्थागत हत्या के बाद देश भर मे धर्मार्थ तथा पुंजिपतीयो कि पोल खुल जाने पर देश भर के लोगो के सामने नया कालेधन का झुटा चित्र बनाया गया.
एक तौर से चेहरा साफ है जो काला धन सामान्य जनता देखी ही नही ना रखी है उसे निकालने का तथा रखने का सवाल उठाना बेबूनियादी है.
दरअसल अपने काले धन को लोगो के सहारे सफेद करना यही मुंख्य उद्देश तथाकथित सरकार का था.
जिसे नोट बंदी के स्वंरुप अमल मे लाया गया.
जिसमे तंत्कालिन सरकार तथा पिछली सरकार सब सामिल हे.
आज जिस तरहॉ से लोगो को लोगो के हि पैसे निकालने तथा डालने पर पाबंदीया लगाने जा रहे हो.
सोचने पर विवश करती है.
वो मजदूर-किसान तथा जन-सामान्य व्यक्ती अपनी उपजिवीका कैसे चलाये.... ?
सामान्य जनता के मन मे सवाल है...!
पर कहने तथा रखने से कतराती है जिसे आप कतार के रुप मे देख रहै है.
चलन-नोट बंदी से कुछ साबित नही होगा यह तो सभी को तथा सरकार को भी मालूम है पर फिर भी लोगो के भलाई का तथा देशभक्ती का प्रमाण देकर सरकार तथा पुंजिपती अपनी काली कमाई विदेशो से लाकर तथा घरो से निकालकर सफेद करने पर तुले है.
पुंजिपतीयो का लोन माफ करना हजारो करोंडो रुपया जो जन-सामान्य व्यक्ती के टॅक्स तथा इंन्कम से वसूला गया. वस्तू-अनाज-तथा अनेक माध्यम से कर वसुली के नाम से लिया गया. उसे पुंजिपतीयो को लोन स्वरुप देकर आज उसको भी माफ किया गया.
दरसल जो खरी हालात से लोन चुकाने मे सक्षम थे. फिर भी उने छोडा गया यह अधिकार सरकार ने कैसे हासिल किये...?
जिसे-जिन्हे हमने चुना है क्या वह हमारी हितो कि तथा समस्या को हल करने के लिये संसद या विधान सभा मे हमारी बाते रखते है...?
क्या हमारी समस्या पर डिबेट होती है...?
या अपने ही हितो के लिएे नये बिल पारित करने पर ध्यान दिया जाता है.
अब नया फंडा लाकर जैसे कि लोगो को इलेंक्शन पुर्व काला धन स्विंझ बॅक मे होने जैसे दावे किये गये तो वह काला धन भारत के हि अदंर कैसा पाया गया...?
क्या सही मै भारत काला धन देश के अंदर जमा करता आया.
या यु कहे कि जिन पुंजिपतो तथा धर्मार्थ शक्ती कि सरकार चुनी गयी या उससेे भी पहले जो सरकारे चलाई गयी.
सभी के काले धन को लिगलाईज अर्थांत सफेद किये जाने के लिएे तथा रोहीत वेमुला कि संस्थागत हत्या के बाद देश भर मे धर्मार्थ तथा पुंजिपतीयो कि पोल खुल जाने पर देश भर के लोगो के सामने नया कालेधन का झुटा चित्र बनाया गया.
एक तौर से चेहरा साफ है जो काला धन सामान्य जनता देखी ही नही ना रखी है उसे निकालने का तथा रखने का सवाल उठाना बेबूनियादी है.
दरअसल अपने काले धन को लोगो के सहारे सफेद करना यही मुंख्य उद्देश तथाकथित सरकार का था.
जिसे नोट बंदी के स्वंरुप अमल मे लाया गया.
जिसमे तंत्कालिन सरकार तथा पिछली सरकार सब सामिल हे.
आज जिस तरहॉ से लोगो को लोगो के हि पैसे निकालने तथा डालने पर पाबंदीया लगाने जा रहे हो.
सोचने पर विवश करती है.
वो मजदूर-किसान तथा जन-सामान्य व्यक्ती अपनी उपजिवीका कैसे चलाये.... ?
सामान्य जनता के मन मे सवाल है...!
पर कहने तथा रखने से कतराती है जिसे आप कतार के रुप मे देख रहै है.
चलन-नोट बंदी से कुछ साबित नही होगा यह तो सभी को तथा सरकार को भी मालूम है पर फिर भी लोगो के भलाई का तथा देशभक्ती का प्रमाण देकर सरकार तथा पुंजिपती अपनी काली कमाई विदेशो से लाकर तथा घरो से निकालकर सफेद करने पर तुले है.
पुंजिपतीयो का लोन माफ करना हजारो करोंडो रुपया जो जन-सामान्य व्यक्ती के टॅक्स तथा इंन्कम से वसूला गया. वस्तू-अनाज-तथा अनेक माध्यम से कर वसुली के नाम से लिया गया. उसे पुंजिपतीयो को लोन स्वरुप देकर आज उसको भी माफ किया गया.
दरसल जो खरी हालात से लोन चुकाने मे सक्षम थे. फिर भी उने छोडा गया यह अधिकार सरकार ने कैसे हासिल किये...?
कोई सामान्य
व्यक्ती अपनी पुरी जिदंगी मे कर्ज चुकाने मे नाकाम हूआ तो उसे जलिल किया
जाता है. उसे माफी नही तो सिधा कानूनी डंडा दिखाकर नंगा किया जाता है यह
कैसे...?
क्या वह सामान्य व्यक्ती देश का नही...?
क्या वह सभी प्रकार के टॅक्स- चिंजो पर अधिकाश पैसा नही भरता...?
क्या वह व्यक्ती देश की प्रगती का हिस्सा नही होता...?
:- हमे पुछना चाहीएे जिसे हम 5 साल के लिएे चुनते वह 500 करोंड का मालिक कैसा बन जाता है...?
:- हमे पुछना चाहीएे जिसे हम नेता मानते है वही हमारी बर्बादी का नेतृत्व कैसे करता है..... ?
:- हमे पुछना चाहीएे हमारे द्वारा लिया गया टॅक्स स्वरुप पैसा किस-किस विकास कामो मेे लगाया गया....?
:- हमे पुछना चाहीएे जिस संविधान ने अभिव्यती कि आजादी दि हो उसे रोक लगाने जैसी साजिश क्यु रची जा रही है.
क्या वह सामान्य व्यक्ती देश का नही...?
क्या वह सभी प्रकार के टॅक्स- चिंजो पर अधिकाश पैसा नही भरता...?
क्या वह व्यक्ती देश की प्रगती का हिस्सा नही होता...?
:- हमे पुछना चाहीएे जिसे हम 5 साल के लिएे चुनते वह 500 करोंड का मालिक कैसा बन जाता है...?
:- हमे पुछना चाहीएे जिसे हम नेता मानते है वही हमारी बर्बादी का नेतृत्व कैसे करता है..... ?
:- हमे पुछना चाहीएे हमारे द्वारा लिया गया टॅक्स स्वरुप पैसा किस-किस विकास कामो मेे लगाया गया....?
:- हमे पुछना चाहीएे जिस संविधान ने अभिव्यती कि आजादी दि हो उसे रोक लगाने जैसी साजिश क्यु रची जा रही है.
" सावालो से सवाल खडे होते है पर यहॉ लोग कतारो मे खडे है "
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बहूत दुखंत घटना है जिस देश कि अर्थ-व्यवस्था को डॉ. बाबासाहाब आंबेडकर जैसे महान व्यक्ती ने पेश कर रखा है.
देश के विकास के लिएे संविधान स्वरुप व्यवस्था दि है.
कही हम भी शायद उन सत्ताधारी के रंग मे उस व्यवस्था का विरोध करते नजर तो नही आ रहै है.
करीब 60 साल बाद फिर से देश को डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जैसा व्यक्ती करीब लग रहा है.
पर सत्ता के नशे मे धुद लोगो को आज भी धर्मार्थ शक्ती का आसरा लेना पड रहा है.
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बहूत दुखंत घटना है जिस देश कि अर्थ-व्यवस्था को डॉ. बाबासाहाब आंबेडकर जैसे महान व्यक्ती ने पेश कर रखा है.
देश के विकास के लिएे संविधान स्वरुप व्यवस्था दि है.
कही हम भी शायद उन सत्ताधारी के रंग मे उस व्यवस्था का विरोध करते नजर तो नही आ रहै है.
करीब 60 साल बाद फिर से देश को डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जैसा व्यक्ती करीब लग रहा है.
पर सत्ता के नशे मे धुद लोगो को आज भी धर्मार्थ शक्ती का आसरा लेना पड रहा है.
ना तो जन-सामान्य कि गलती है | और नाही नेता या नेतृत्व के नाम से फसाने वाले व्यक्ती कि दरअसल हमे कुछ एक सवाल को खडा करना पडेगा.
कि इस विवाद मे रोहीत अॅक्ट का क्या... ?
कि इस विवाद मे दलित-आदीवासी का क्या...?
कि इस विवाद दंगल-ग्रस्त मुसलमानों का क्या...?
कि इस विवाद मै 1984 के सिंखो के हत्याओं का क्या...?
कि इस विवाद मे अल्पसंख्याक लोगो के अत्याचारों पर न्याय व्यवस्था का रुख क्या... ?
कि इस विवाद मे जो जल-जंगल-जमिन को जिसे पुंजिपती लुट रहै है उनके सवालो का क्या...?
कि इस विवाद मे जो JNU का विद्यार्थि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है. उसकी आवाज को कुचल देना की नितीयो का क्या...?
इस विवाद मै शिक्षा-रोजगार-आरोग्य-तथा प्रगत विचारो के साहारे देश के निर्माण का क्या...?
इस विवाद मे उन बेजूबान-मॉ का क्या जो अपने बेटे के लिएे गुहार लगा रही हो...?
इस विवाद मे अभिव्यक्ती का क्या जो पत्रकार सच्चाई बयान करे उसका क्या...?
इस विवाद मे नजिब का क्या जो धर्मार्थ शक्ती द्वारा उठा लिया गया हो...?
इस विवाद मे सत्ता मे बैठ छत्तिसगढ-झारखंड-ओरिसा-मणिपुर- महाराष्ट्र मे पुलिस द्वारा ग्रिन हंन्ट चला कर कई युवक-युवतियों का मारा जा रहा है उसका क्या...?
इस विवाद मे उस बलात्कारी का क्या जो अंधेरे मे शहरों मे करता है तथा
उस वर्दी धारी का क्या जो जंगलो मे करता है...?
हमे इस विवाद मे किसानो को देखना है.
हमे इस विवाद मे मजदूर को रखना है.
हमे इस विवाद मे उस आम जन-सामान्य व्यक्ती के विचारो को रखना है. जिन्हे आप आज नोटबंदी के सहारे उन विचारों को मिटाना चाहते हों.
हमे सवाल करना है ...
तुम से --सत्ता से -- देश को नेतृत्व कर रहे प्रधान से और हमे पुछना है
" क्या हम इस देश का हिस्सा है भी या नही.
क्या हम इस देश के क्रांन्तीकारी विचारो से आझाद हूएे एक स्वंतत्र नागरिक है या नही.
क्या हमे अपने विचारो को रखने का स्वातंत्र है या नही ..?
क्या हमे सवाल रखने के या पुछने का हक है या नही...?
कि इस विवाद मे दलित-आदीवासी का क्या...?
कि इस विवाद दंगल-ग्रस्त मुसलमानों का क्या...?
कि इस विवाद मै 1984 के सिंखो के हत्याओं का क्या...?
कि इस विवाद मे अल्पसंख्याक लोगो के अत्याचारों पर न्याय व्यवस्था का रुख क्या... ?
कि इस विवाद मे जो जल-जंगल-जमिन को जिसे पुंजिपती लुट रहै है उनके सवालो का क्या...?
कि इस विवाद मे जो JNU का विद्यार्थि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है. उसकी आवाज को कुचल देना की नितीयो का क्या...?
इस विवाद मै शिक्षा-रोजगार-आरोग्य-तथा प्रगत विचारो के साहारे देश के निर्माण का क्या...?
इस विवाद मे उन बेजूबान-मॉ का क्या जो अपने बेटे के लिएे गुहार लगा रही हो...?
इस विवाद मे अभिव्यक्ती का क्या जो पत्रकार सच्चाई बयान करे उसका क्या...?
इस विवाद मे नजिब का क्या जो धर्मार्थ शक्ती द्वारा उठा लिया गया हो...?
इस विवाद मे सत्ता मे बैठ छत्तिसगढ-झारखंड-ओरिसा-मणिपुर- महाराष्ट्र मे पुलिस द्वारा ग्रिन हंन्ट चला कर कई युवक-युवतियों का मारा जा रहा है उसका क्या...?
इस विवाद मे उस बलात्कारी का क्या जो अंधेरे मे शहरों मे करता है तथा
उस वर्दी धारी का क्या जो जंगलो मे करता है...?
हमे इस विवाद मे किसानो को देखना है.
हमे इस विवाद मे मजदूर को रखना है.
हमे इस विवाद मे उस आम जन-सामान्य व्यक्ती के विचारो को रखना है. जिन्हे आप आज नोटबंदी के सहारे उन विचारों को मिटाना चाहते हों.
हमे सवाल करना है ...
तुम से --सत्ता से -- देश को नेतृत्व कर रहे प्रधान से और हमे पुछना है
" क्या हम इस देश का हिस्सा है भी या नही.
क्या हम इस देश के क्रांन्तीकारी विचारो से आझाद हूएे एक स्वंतत्र नागरिक है या नही.
क्या हमे अपने विचारो को रखने का स्वातंत्र है या नही ..?
क्या हमे सवाल रखने के या पुछने का हक है या नही...?
__लिखना तो बहोत हे पर अनेक बातो को रख नही पाया. कुछ बाते
छुटी है पर सामान्य तौर पर जो देख रहा हू मै भी आप मे से ही हू मै भी सवाल
करना चाहता हू.
आज का युवा होने के नाते साथियो मेरे लिखने मे तथा रखने मे किसी का मन -दिल तुट रहा होगा तो माफ किजीये.
जय भिम..../आज का युवा होने के नाते साथियो मेरे लिखने मे तथा रखने मे किसी का मन -दिल तुट रहा होगा तो माफ किजीये.
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